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भय में भाजपा
छत्तीसगढ़ संभवत: देश का ऐसा इकलौता राज्य होगा जहां पर भाजपा यानि कि भारतीय जनता पार्टी भय में नजर आती है. तो क्या कारण हो सकता है?

इस तरह के सवालों के जवाब ढूंढने में जो कारण नजर आए वह विचारणीय है. दरअसल छत्तीसगढ़ में भाजपा के पास कोई भूपेश बघेल सा दमदार विपक्षी नेता नहीं है.

भाजपा के पास छत्तीसगढ़ में भी दमदार नेताओं की पूरी फौज पड़ी है लेकिन फिर भी भाजपा क्यूंकर भय में है? इसके पीछे के कारणों का गौर करें उसके पहले 2018 में हुई करारी हार के कारणों पर गौर करेंगे.

सीएम नहीं सुपर सीएम हारे…

छत्तीसगढ़ की राजनीति को करीब से देखने वाले मुकेश द्विवेदी बताते हैं कि वह हार डा. रमन सिंह की नहीं थी बल्कि सुपर सीएम की थी. उल्लेखनीय है कि उन दिनों डा. रमन सिंह मुख्यमंत्री होने की अपनी तीसरी पारी खेल रहे थे.

कभी भाजपा से जुड़े रहे वीरेंद्र पांडे से पत्रकारों ने उस राजनांदगांव की भूमि पर सुपर सीएम कौन है करके पूछा था जो कि डा. रमन सिंह के निर्वाचन मुख्यालय का तमगा रखता है. तब उन्होंने एक ऐसे अधिकारी का नाम लिया था जिसका ताल्लूकात छत्तीसगढ़ से तो कभी नहीं रहा था.

मुख्यमंत्री रहने के दौरान अजीत प्रमोद कुमार जोगी को डैडी कहकर पुकारने वाले आईपीएस से लेकर ढेरों आईएएस अच्छी पोस्टिंग पाने सुपर सीएम के चक्कर लगाने लगे थे. तब सीएम से ज्यादा सुपर सीएम की प्रशासनिक, मीडिया, न्यायपालिका जैसे क्षेत्रों में चलने लगी थी.

यह वह समय था जब भाजपा के कार्यकर्ताओं के काम नहीं हो रहे थे. भले ही सरकार उनकी अपनी रही हो.

ऊपर से साम-दाम,दंड-भेद पर भरोसा करने वाले भूपेश बघेल का दमदार नेतृत्व कांग्रेस के पास था जिसके चलते भाजपा कमजोर से कमजोर होती चली गई.

15 साल प्रदेश में राज करने वाली भाजपा के खाते में सिर्फ 15 विधानसभा सीट क्यूंकर आई थी? क्या वाकई भाजपा का कार्यकर्ता नाराज था? क्या वाकई पितृ संगठन आरएसएस ने छत्तीसगढ़ भाजपा से दूरी बना ली थी?

ग्रामीण पत्रकारिता से जुड़े दर्वेश आनंद इसे ऐसे परिभाषित करते हैं कि कार्यकर्ताओं ने न तो चुनाव में रूचि ली और न ही उन्होंने उन मतों को बाहर निकाल मतदान केंद्र तक ले जाने की जिम्मेदारी निभाई जिसके लिए वह जाने जाते हैं.

घिसे पीटे चेहरे, आक्रामकता का अभाव

2018 की चुनावी हार के बाद ऐसा नहीं है कि भाजपा ने बदलने का प्रयास नहीं किया हो लेकिन उसे रत्तीभर सफलता नहीं मिल पाई.

ऊपर से उसके पास जो चेहरे थे वह जनता के बीच घिसे पीटे से हो गए थे. वहीं डा. रमन सिंह का वह सौम्य चेहरा अपनी चमक खो रहा था जिसे आगे रखकर भाजपा ने तीन चुनावी वैतरणी प्रदेश में पार की थी.

इधर पार्टी के अन्य चेहरे भी जिन महत्वपूर्ण पदों पर चुनें गए वह किसी काम के नहीं रह गए. क्या धरमलाल कौशिक और क्या विष्णुदेव साय… सबके सब फेल. इससे भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी संभवत: सकते में है.

धरमलाल कौशिक विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं. प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं. और इस बार फिर उन्हें नेता प्रतिपक्ष का पद दे दिया गया. जबकि भाजपा यहां अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा जैसे तेज तर्रार नेताओं पर दांव खेल सकती थी.

विष्णुदेव साय साफ सुथरी छवि के नेता माने जाते हैं. उनका व्यवहार भी बड़ा सरल है. वह केंद्रीय मंत्री रहने के अलावा पूर्व में प्रदेश अध्यक्ष रह चुके थे लेकिन उन्हें एक बार फिर राज्य की कमान देकर भाजपा ने एक तरह से खुद का पैर कुल्हाड़ी में मार दिया.

साय की जगह संभवत: विजय बघेल, संतोष पांडे, सरोज पांडे जैसे तेज तर्रार नए चेहरे को भाजपा को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहिए था लेकिन वह इसमें चूक गई. ऊपर से वह ओपी चौधरी जैसे प्रशासनिक अधिकारी रहे अपने नेता का भी सदुपयोग नहीं कर पा रही है.

वह मुद्दे जो कांग्रेस छिन के ले गई

इधर छत्तीसगढ़ भाजपा के पास जनता के प्रिय चेहरों का अभाव है और उधर वैसा ही अभाव उसके समक्ष मुद्दों का भी है. ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिनक सहारे भाजपा देश के विभिन्न प्रदेशों में जीत हासिल करती रही लेकिन यहां यह मुद्दा कांग्रेस ने उससे छिन लिया.

छत्तीसगढिय़ों के बीच कका व दाऊ जैसे संबोधनों से पुकारे जाने वाले ठेठ छत्तीसगढिय़ा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल यहां बेहद चतुर चालाक नजर आते हैं. उन्हें छत्तीसगढ़ में कौशिल्या के उस राम को पूजने वाला माना जाता है जो राम भाजपा के राम से अलग है.

मुख्यमंत्री ने यहां पर भी अपनी राजनीतिक परिपक्वता दिखाई कि उसने भाजपा से एक के बाद एक मुद्दे छिन कर उसे भौथरा कर दिया है. राम के मुद्दे के अलावा उन्होंने गौ माता का सबसे बड़ा सेवक स्वयं को मानने लोगों को मजबूर किया है.

बघेल के ही नेतृत्व में यहां गौ माता न केवल पूजी जा रही है बल्कि पशुपालकों जो कि अमूमन किसान होते हैं को होने वाली आय का एक अतिरिक्त जरिया भी गौ माता ही है. यहां गोबर बिक रहा है.

बताया तो यह तक जाता है कि आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार गौ मूत्र भी खरीदेगी. यह मुद्दा कितना असरकारक है इसे ऐसे समझिए कि कुछ ऐसी ही योजनाएं बघेल की देखा देखी भाजपा के कुछ एक दिगर राज्यों में शुरू हो रही है या हो गई है.

मतलब भाजपा का धार्मिक मुद्दा भी गया. इधर छत्तीसगढिय़ा वाद की कोई काट भाजपा इतने दिनों में भी ढूंढ नहीं पाई है. प्रयास भले ही ऊपर से नीचे तक हो रहे हो लेकिन नतीजा शून्य बटे सन्नाटा नजर आता है.

बघेल के रूप में कांग्रेस के पास एक ऐसा मुख्यमंत्री है जो भौंरा चलाता है… गेड़ी चढ़ता है… अपरा पैरी के धार जैसे लोक संगीत के गीतों को बेहिचक बेधड़क गाता है. भाजपा के पास ऐसा कोई चेहरा इन दिनों दिखाई नहीं देता है.

किसान ऊपर से भाजपा से नाराज हैं. पहले धान के समर्थन मूल्य निर्धारण को लेकर भाजपा से गलती हुई और उसके बाद बघेल ने ऐसा समर्थन मूल्य घोषित किया जो कि एक तरफा किसानों को अपनी ओर आकर्षित करता है.

भाजपा पिछला चुनाव प्रशासनिक अधिकारियों पर अपने सक्षम नियंत्रण नहीं हो पाने के चलते हारी थी जबकि भूपेश बघेल का बतौर मुख्यमंत्री अपने अधिकारियों पर जबरदस्त नियंत्रण है. इतना जबरदस्त नियंत्रण कि कई मर्तबा उन्हें लेकर आपत्ति उठने लगती है.

क्या कर रहा है नेतृत्व?

ऐसा नहीं है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व छत्तीसगढ़ की स्थिति से वाकिफ नहीं है. वह जानता सब कुछ है. उसे अभी कुछ भी करने के लिए समय नहीं मिल पा रहा है. दूसरा वह छत्तीसगढ़ से ज्यादा महत्वपूर्ण माने जाने वाले राजस्थान, कर्नाटक जैसे अपने पसंदीदा राज्यों की आंतरिक कलह को थामने में लगा है. जिस दिन वह वहां से फारिग हुआ तो तब छत्तीसगढ़ में बहुत कुछ बदल जाएगा. तब छत्तीसगढ़ भाजपा के पास मुद्दे भी होंगे… चेहरे भी होंगे और पलटकर वार करने वाला नेतृत्व भी होगा. लेकिन तब तक शायद बड़ी देर न हो जाए. अगले वर्ष के अंत में विधानसभा चुनाव है. कांग्रेस की वर्तमान स्थिति देश में चाहे जैसी भी हो लेकिन छत्तीसगढ़ में वह निर्विवाद रूप से मजबूत मानी जाती है.

इक्का दुक्का ऐसे मुद्दे जो कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की निर्णय क्षमता के चलते निर्मित हुए हैं उन मुद्दों को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस छत्तीसगढ़ में वर्षों पुरानी वाली नजर आती है. तब कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी गाय बछड़ा हुआ करता था.

फिलहाल भाजपा यहां भय में ही नजर आती है. उसका भय इस बात का है कि यदि वह एक बार फिर चुनावी हार छत्तीसगढ़ में झेलती है तो उसके शीर्ष नेतृत्व की कांग्रेस मुक्त भारत की कल्पना पूरी नहीं हो पाएगी.

दरअसल कांग्रेस एक विचार है. आदमी भले ही मर जाए लेकिन विचार कभी मरा नहीं करते हैं. जिस तरह का विचार राष्टीय स्वयं सेवक संघ रखता है उस तरह के विचार से दिगर विचार कांग्रेस का है और यही उसे अब तक जिंदा रख रहा है.

अपनी शक्ति भूल गई भाजपा

राजनीति विश्‍लेषक मृत्‍युंजय इस मुद्दे को नए एंगल से देखते हैं. उनके देखने का एंगल भाजपा के पसंदीदा विषय धर्म से जुड़ाहुआ है. वे कहते हैं कि, जिस तरह हनुमान जी अपनी शक्ति भूल गए थे ठीक उसी तरह कि स्थिति छत्‍तीसगढ़ भाजपा की है. जब कोई चेहरा उसे उसकी शक्तियों का भान कराने आएगा उस दिन तस्‍वीर और भाजपा की तकदीर भी हर हाल में बदल जाएगी.

नवभारत की संपादकीय टीम में रहे वरिष्‍ठ पत्रकार ने नाम नहीं छापने की शर्त में बताया कि भाजपा की खूबी नए चेहरों को आगे करने की रही है। लेकिन भाजपा ने यही गलती 2018 के विधानसभा चुनाव में करी थी। ज्‍यादातर चेहरे दोबारा – तिबारा आजमाए जा रहे थे। भाजपा के कोर वोटर ने इस दोहराव को पूरी तरह से नकार दिया था और यह सिलसिला आज भी चल रहा है।

दैनिक भास्‍कर के संपादक रहे एक अन्‍य पत्रकार कहते हैं कि, भाजपा दरअसल भूपेश बघेल के खाटी छत्‍तीसगढि़या होने की काट अब तक ढूंढ नहीं पाई है। यही उसकी कमजोरी है और यही उसकी असफलता का कारण है। जिन चेहरों के सहारे भाजपा प्रदेश में राजनीति कर रही है वह चेहरे ठुकरा दिए गए हैं। जब तक चेहरों में बदलाव नहीं होगा तब तक भाजपा की स्थिति भी बदलने से रही।

बदलाव की नीति से छेड़छाड़

विश्‍लेषकों के इस आंकलन में गहराई है. वर्ष 2008 के चुनाव का दौर था. भाजपा ने प्रदेश में कई दिग्‍गजों को दरकिनार कर नए चेहरों को आजमाया. इससे संगठन के भीतर ही हलचल मच गई. पार्टी में असंतोषियों की संख्‍या में भी इजाफा हो गया. कई ऐसे चेहरों की बलि दे दी गई जो मंत्री तक रहे थे. ये अप्रत्‍याशित निर्णय भाजपा के भविष्‍य के लिए बड़ा दांव था.

इस चुनाव में भाजपा ने कुछ ऐसी सीटें हारी थीं जो पारंपरिक रुप से भाजपा के ही पाले की मानी जाती थी. कहा गया कि, भाजपा ने कांग्रेस को वॉकओवर दिया. लेकिन इससे फर्क नहीं पड़ा क्‍यूंकि भाजपा ने अपने इस दांव को भी सफल और निर्णायक साबित किया था. पुराने चेहरों के दोहराव को भाजपा भांप चुकी थी और चेहरे बदले जाने के निर्णय ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी.

भाजपा इस पैंतरे को लगातार आजमाती रही लेकिन वर्ष 2018 के चुनावों में यह नीति सिर्फ कुछ ही चेहरों के लिए अमल में लाई गई. भाजपा उन चेहरों का टिकट काटने की हिम्‍मत नहीं जुटा पायी जो नामी तो थे लेकिन संगठन के भीतर ही उनका आधार खोखला हो चुका था. यही नहीं उनके निर्वाचन क्षेत्र में भी स्थितियां उनके पक्ष में नहीं थी.

नई लीडरशीप खड़ा करना चाहता है संगठन

बीते विधानसभा चुनावों के बाद से भाजपा अपनी हार का विश्‍लेषण कर रही है. केंद्रीय कोर कमेटी भी यहां दिलचस्‍पी ले रही है. संगठन में भी परिवर्तन की मुहिम छेड़ी गई. विपक्ष में मजबूत कंधों की जरुरत को भांपते हुए भाजपा ने युवा विंग में अंडर-35 का फॉर्मूला लागू कर दिया. 35 वर्ष से कम उम्र के नौजवान युवा मोर्चा संभाल रहे हैं. इससे ज्‍यादा उम्र के युवाओं को पार्टी ने भाजपा संगठन से जोड़ लिया.

युवाओं को मौका देकर और 35 वर्ष से अधिक उम्र के युवाओं को भाजपा से जोड़कर संगठन एक नई लीडरशीप तैयार करने में जुटी हुई है. छत्‍तीसगढ़ की राजनीति में चर्चित चेहरे काफी रहे हैं लेकिन भाजपा के पास मौजूदा समय में ऐसे चेहरों और आक्रामकता की कमी है. ऐसे में नए चेहरों को संगठन में परखना और उन्‍हें आगे मौका देने की संभावनाएं दिखाई देती है.

भाजपा इस ओर बढ़ तो रही है लेकिन अब तक इसके आगे क्‍या होगा इसे लेकर संशय की स्थिति है. अप्रत्‍याशित निर्णयों से चौंकाने वाली भाजपा ने यहां अब भी पूरे पत्‍ते नहीं खोले हैं. ऐन वक्‍त में बड़े बदलाव के फैसले भी भाजपा के खिलाफ जा सकते हैं.

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