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    छत्तीसगढ़ की सामाजिक एकता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं, UCC पर भाजपा सरकार पहले जनता को जवाब दे : आफताब आलम

    news_syncBy news_syncOctober 16, 2026No Comments5 Mins Read
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    रायपुर। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के संयुक्त महासचिव आफताब आलम ने समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ जैसे बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक और आदिवासी परंपराओं से समृद्ध राज्य में बिना व्यापक जनसहमति के समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश गंभीर सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकती है। भाजपा सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर ऐसी क्या जल्दबाजी है, जिसके कारण वह देश और प्रदेश की विविध सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों पर व्यापक चर्चा किए बिना इस संवेदनशील मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहती है।

    आफताब आलम ने कहा कि छत्तीसगढ़ केवल एक भौगोलिक राज्य नहीं, बल्कि विभिन्न धर्मों, समुदायों, आदिवासी परंपराओं, लोकसंस्कृतियों और पारिवारिक मान्यताओं का जीवंत संगम है। यहां की सामाजिक व्यवस्था सदियों से आपसी सम्मान, सहअस्तित्व और सांस्कृतिक विविधता पर आधारित रही है। विवाह, पारिवारिक जीवन, उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े विषय लोगों की धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक परंपराओं से जुड़े हुए हैं। ऐसे में किसी भी एकरूप कानूनी व्यवस्था को लागू करने से पहले छत्तीसगढ़ की विशिष्ट परिस्थितियों को समझना और जनता का विश्वास हासिल करना जरूरी है।

    उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज की अपनी विशिष्ट परंपराएं और प्रथागत व्यवस्थाएं हैं। संविधान की पांचवीं अनुसूची, अनुसूचित क्षेत्रों की विशेष परिस्थितियों तथा लागू कानूनों के अंतर्गत प्राप्त संरक्षणों पर किसी भी प्रस्तावित व्यवस्था के संभावित प्रभाव का स्पष्ट आकलन होना चाहिए। आदिवासी समाज की परंपराओं और अधिकारों को लेकर किसी भी प्रकार की अनिश्चितता पैदा करना स्वीकार्य नहीं है। सरकार पहले स्पष्ट करे कि प्रस्तावित UCC का छत्तीसगढ़ के अनुसूचित क्षेत्रों, आदिवासी समुदायों और उनकी प्रथागत व्यवस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

    आफताब आलम ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है, लेकिन यह नीति-निदेशक तत्वों का हिस्सा है। इसके साथ धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकारों और अन्य संवैधानिक संरक्षणों का भी सम्मान करना अनिवार्य है। किसी एक प्रावधान का हवाला देकर समाज के विभिन्न वर्गों की आशंकाओं और संवैधानिक अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार समान नागरिक संहिता जैसे गंभीर विषय को व्यापक सामाजिक सुधार की प्रक्रिया बनाने के बजाय राजनीतिक बहस का मुद्दा बना रही है। यदि सरकार की मंशा वास्तव में समानता और न्याय सुनिश्चित करना है, तो उसे पहले महिलाओं के अधिकारों, संपत्ति में समान हिस्सेदारी, कानूनी सहायता और न्याय तक समान पहुंच जैसे मुद्दों पर ठोस कार्रवाई करके दिखानी चाहिए।

    आफताब आलम ने छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र सरकार के सामने निम्नलिखित मांगें रखीं:

    1. छत्तीसगढ़ में व्यापक जनसंवाद: UCC से संबंधित किसी भी निर्णय से पहले प्रदेश के सभी जिलों में सार्वजनिक परामर्श आयोजित किए जाएं। सामाजिक संगठनों, महिला संगठनों, आदिवासी प्रतिनिधियों, धार्मिक संस्थाओं, विधि विशेषज्ञों और नागरिक समाज को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए।

    2. आदिवासी अधिकारों पर स्पष्टता: प्रस्तावित व्यवस्था का पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों, आदिवासी समुदायों, उनकी प्रथागत परंपराओं और लागू संवैधानिक संरक्षणों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस संबंध में सरकार विस्तृत श्वेतपत्र जारी करे।

    3. संविधानसम्मत कानूनी परीक्षण: UCC के किसी भी प्रस्तावित प्रावधान का धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकारों और मौलिक अधिकारों के संदर्भ में विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण कराया जाए। संभावित कानूनी टकरावों पर सरकार स्पष्ट जवाब दे।

    4. महिलाओं को वास्तविक न्याय: महिलाओं के संपत्ति अधिकार, घरेलू हिंसा से सुरक्षा, भरण-पोषण, कानूनी सहायता और न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। समानता के दावों को केवल राजनीतिक नारों तक सीमित न रखा जाए।

    5. प्रस्तावित कानून का प्रारूप सार्वजनिक हो: सरकार कानून के मसौदे, उसके दायरे, अपवादों और विभिन्न समुदायों पर संभावित प्रभावों को सार्वजनिक करे, ताकि जनता बिना किसी भ्रम के उसके प्रावधानों पर चर्चा कर सके।

    6. छत्तीसगढ़ की सामाजिक परिस्थितियों का आकलन: राज्य में विभिन्न समुदायों की परंपराओं और प्रथाओं का अध्ययन कर स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित की जाए। समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और उस पर विधानसभा में चर्चा हो।

    7. राजनीतिक ध्रुवीकरण से परहेज: केंद्र और राज्य सरकारें इस संवेदनशील विषय पर ऐसी बयानबाजी से बचें, जिससे धार्मिक समुदायों के बीच अविश्वास या सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका हो।

    आफताब आलम ने कहा कि यदि किसी कानून को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में गंभीर आशंकाएं हैं, तो सरकार का दायित्व उन आशंकाओं का समाधान करना है, न कि उन्हें अनसुना करके आगे बढ़ना। कानून जनता के विश्वास से मजबूत होता है, राजनीतिक दबाव से नहीं। छत्तीसगढ़ की शांति, सामाजिक सद्भाव और आदिवासी अस्मिता को प्रभावित करने वाले किसी भी निर्णय में पारदर्शिता और व्यापक जनभागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए।

    उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, संवैधानिक अधिकारों और सभी नागरिकों की समान गरिमा के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध है। सुधारों का उद्देश्य वास्तविक अन्याय दूर करना होना चाहिए, न कि समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ाना। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह सामाजिक न्याय के लिए काम कर रही है या इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है।

    आफताब आलम ने कहा कि भाजपा सरकार को छत्तीसगढ़ की जनता के सामने अपनी मंशा और प्रस्तावित कानून के प्रभावों को स्पष्ट करना चाहिए। प्रदेश की जनता को विश्वास में लिए बिना कोई भी कदम उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं होगा। छत्तीसगढ़ की विविधता, आदिवासी अधिकारों और सामाजिक सद्भाव की रक्षा सर्वोपरि है।

    “छत्तीसगढ़ की जनता को राजनीतिक प्रयोग नहीं, संवैधानिक सुरक्षा और सामाजिक न्याय चाहिए। हमारी मांग स्पष्ट है—पहले संवाद, पहले पारदर्शिता, पहले संवैधानिक परीक्षण और पहले जनता को जवाब। छत्तीसगढ़ की विविधता और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े सवालों को नजरअंदाज करके कोई फैसला स्वीकार्य नहीं होगा।”

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